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मेरी बात — “पति – पत्नी का प्यार एक स्नेह का धागा हैँ “= “प्रवीण कुमार “( टीम भागवत ग्रुप कारपोरेशन )

पति – पत्नी के प्यार का डोर एक स्नेह का बंधन हैँ — प्रबिन कुमार ( भागवत ग्रुप )= कहानी पार्ट – 2

“घबराओ मत! मैं तुम्हें पूरा-पूरा सहयोग दूंगी. तुमने बड़ी बहन मानकर मुझसे अपनी समस्या शेयर की है.. मैं तुम्हें निराश नहीं करूंगी.. तो कब मिलवा रहे हो मुझे उनसे?”
“आज शाम को ही. ऑफिस से आप मेरे साथ ही चलना.” वादे के मुताबिक़ कुसुम शाम को अनीश के संग उसके घर पहुंच गई. बच्चों को उसने पहले ही फोन पर देरी से घर पहुंचने की सूचना दे दी थी. अनीश के घर के हालात बता रहे थे कि अनीश ने उसके आगमन की घर पर कोई पूर्व सूचना नहीं दी थी. शायद वह उसके सम्मुख समस्या का पूरा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख देना चाहता था. चारों ओर बच्ची के गंदे कपड़े, डायपर, सेरेलक और दूध के बर्तन बिखरे हुए थे. अनाया बिस्तर पर गहरी नींद सोई हुई थी और पास ही ज़मीन पर बैठी रिया बिस्तर पर सिर टिकाए बेसुध सी पड़ी थी. स्पष्ट था कि काफ़ी संघर्ष के बाद उसे ये पल नसीब हुए थे. ढीला ढाला पजामा, उस पर छोटी-सी टी-शर्ट, क्लचर में से निकलकर गालों पर झूलती अनसुलझे बालों की लटें, क्लांत चेहरे पर इतनी मासूमियत कि कुसुम के मुंह से बेसाख्ता निकल गया, “यह तो ख़ुद नितांत बच्ची है.”
आहट से रिया की नींद टूट गई और बच्ची भी कुनमुनाने लगी. कुसुम लपककर उसके सिरहाने पहुंच गई ओैर उसे थपथपाने लगी. तुरंत वह फिर से गहरी नींद सो गई. रिया सकपकाई-सी अपने कपड़े, बाल आदि ठीक करने लगी, तो कुसुम ने प्यार से उसके गाल थपथपा दिए, “रिलैक्स! मैं तुम्हारी पड़ोसन हूं. तुम्हारे पति की बड़ी बहन के समान! हम एक ही ऑफिस में हैं.”
“कुसुम दीदी? अनीश ने बताया था आपके बारे में.” रिया सहज हो गई थी. कुसुम नहीं चाहती थी कि रिया अपने औघड़पन या अपरिपक्व मातृत्व को लेकर किसी शर्मिंदगी से घिरे, इसलिए उसने तुरंत बात बनाई. “अनीश कब से मुझसे ऑफिस का सिस्टम समझना चाह रहा था. ऑफिस में वक़्त ही नहीं मिल रहा था. तो फिर आज हमने घर पर ही बैठकर बात करने का निर्णय ले लिया. तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं?”
“अरे नहीं.”
“अरे रिया, तुम्हें अपनी कुछ पर्सनल शॉपिंग करनी थी न! तो मैं घर पर ही हूं.अनाया भी सो रही है. तुम हो आओ.” अनीश बोल उठा. रिया ने अविश्वासभरी नज़रों से पति को घूरा.

“पीछे से जग गई तो?”
“म… मैं संभाल लूंगा…” अनीश की ज़ुबान लड़खड़ा रही थी. उसे ख़ुद भरोसा नहीं था कि वह कर पाएगा. रिया को वैसे अकेले शॉपिंग करना पसंद था, क्योंकि अनीश जल्द ही उकता जाता था. किंतु अनाया के होने के बाद वह कभी अकेले शॉपिंग के लिए नहीं निकली थी. अनीश उसके बगैर भी अनाया को संभाल सकता है, उसे यक़ीन नहीं था.

“मैं हूं न! मैं मदद कर दूंगी.”
क्लांत रिया में अचानक बिजली की सी फुर्ती आ गई. पांच मिनट में ही वह तैयार होकर पर्स झुलाती आ खड़ी हुई. चुस्त जींस, खुले बाल, लिपस्टिक लगे होंठों में वह बला की ख़ूबसूरत लग रही थी. चंद मिनटों में ही उसका कायाकल्प हो गया था.अनीश तो उसे अपलक निहारे ही जा रहा था.
“तुम्हारी ही बीवी है…” कुसुम ने चुहल की, तो दोनों ही शरमा गए.

अगले दिन ऑफिस में अनीश कुसुम से आकर मिला, तो ख़ुशी उसके रोम-रोम से फूट पड़ रही थी.

“डिलीवरी के बाद मुझे कल पहली बार अपनी रिया में पहले वाली रिया का अक्स देखने को मिला. शॉपिंग बैग से लदी-फदी वह बेहद ख़ुशनुमा मूड में कल घर लौटी. बाज़ार में उसकी सहेली मिल जाने से उसका शॉपिंग का मज़ा दुगुना हो गया था. प्रसूति के बाद उसने पहली बार अपना मनपंसद स्ट्रीट फूड पपड़ी चाट खाई. पर उस वक़्त भी उसे अनाया के हाजमे का ख़्याल आ गया, इसलिए बेचारी एक प्लेट ही खा पाई.”
“उसे कहना कभी-कभी थोड़ा ऐसा-वैसा खा लेने में कोई हर्ज नहीं है. बच्चे का हाजमा भी तो मज़बूत करना होगा.”
“अच्छा ऐसा है? मैं बोल दूंगा. मेरे तो कल यह सोचकर हाथ-पैर फूल रहे थे कि अकेले अनाया मुझसे संभलेगी या नहीं? आपके जाने के बाद काफ़ी देर तक तो वह सोती ही रही. तब तक बाई आ गई, तो मैंने उससे सारा घर व्यवस्थित करवा दिया. दरअसल, मन में यह संबल था कि कुछ कदमों की दूरी पर ही आप मदद के लिए मौजूद हैं… एक मदद और चाहिए थी. दो दिन बाद मदर्स डे है. मैंने अनाया की ओर से रिया के लिए यह कार्ड तैयार किया है. आप बताइए यह उसे पसंद तो आ जाएगा न?”

मुख्य पृष्ठ पर रिया की गोद में अनाया की बेहद प्यारी तस्वीर थी. अंदर का विवरण इस प्रकार था- ‘मॉम ,आपकी ज़िंदगी की पहली प्राथमिकता बनकर मैं बहुत गौरवान्वित महसूस करती हूं. जानती हूं, मुझे बड़ा करने में आपको बहुत कष्ट उठाने पड़ रहे हैं. बहुत समझौते करने पड़ रहे हैं, पर क्या करूं? मैं पूर्णतः आप पर निर्भर हूं. आप सबकी जगह ले सकती हैं, पर कोई आपकी जगह नहीं ले सकता.’ आपकी अनाया
“बहुत मार्मिक भाव अभिव्यक्ति! यदि अनाया बोल सकती होती, तो सचमुच यही सब कहती…” कुसुम ने अनीश को प्रोत्साहित किया था. उत्साहित अनीश को अब बेसब्री से रिया की प्रतिक्रिया का इंतज़ार था. मदर्स डे के दिन ‘हैप्पी मदर्स डे’ लिखा केक काटते रिया सचमुच भावविभोर हो गई थी. फिर जब अनीश ने अनाया के हाथ से उसे कार्ड पकड़वाया, तो वह आश्चर्यचकित तुरंत उसे खोलकर पढ़ने लगी..पूरा पढ़ते-पढ़ते रिया की आंखें नम हो गई थीं. लपककर उसने अनीश की गोद से अनाया को लगभग छीन ही लिया और सीने से चिपकाकर ताबड़तोड़ चूमने लगी.रिया आज सही मायने में अनाया की मॉम बन गई थी.

मुख्य संपादक – अरुण कुमार