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“पैसौं की चाहत में बिखरते रिश्ते “– अरुण कुमार (लेखक सह पत्रकार)

मेरी बात— पैसों की टोह में टूटते रिश्ते=—— अरुण कुमार ( लेखक सह पत्रकार)

रिश्तों की डोर और पैसों की टोह अगर हम सब इनदोनों के शब्दों की परिभाषा को समझने की कोशिश करें तो कुछ बातें जो छन कर निकलती हैँ उसमें आज की इस कलयुग रूपी समाज में रिश्तों की ये डोर थोड़ी कमजोर सी जान पड़ती हैँ या पड़ रही हैँ क्योंकि पैसों की भवर में फंसकर इंसान अपना विवेक के साथ साथ उन रिश्तों को भी दरकिनार कर देता हैँ जो रिश्ता उस इंसान के लिए किसी सूक्ष्म मायने से भी कम नहीं था किन्तु कुछ बातें जिंदगी की इस खट्टी मीठी यादें बन कर रहने को मजबूर हो जाती हैँ अगर हमसब कल्पना करें की आज एक इंसान पैसों को इतना महत्व देने लगता हैँ कि उनके आपसी रिश्ते उस अनजान भवर में फंस कर अपनी विलुप्ति की कगार पर खड़े रहने को मजबूर होते जा रहे हैँ जबकि सभी को पता हैँ कि पैसों की अहमियत एक समय तक ही हैँ ना कि जीवन भर तक फिर भी ना जाने वो इंसान अपने जीवन में पैसों को लेकर इतना संजीदा कैसे और क्यूँ बना रहता हैँ अब ये रिश्ते और इस पैसे के चक्कर में पड़कर इंसान अपने उस कर्म और कर्तव्य को भूल जाने को आतुर हैं जो की उसके जीवन के लिए किसी कड़वी सच्चाई से कम भी नहीं हैँ जैसा कि मैंने अपने पिछले एक आर्टिकल में बतलाया था कि अगर आज आपके बच्चे आपके स्वयं के अभिभावक के प्रति सकारात्मक भाव नहीं रखते हैँ तो स्मरण रहे कि आनेवाले समय में वहीँ बच्चे आपके मान और सम्मान के साथ खिलवाड़ करने से भी नहीं चुकेंगे क्योंकि इतिहास गवाह हैँ कि जिस पेड़ पर फल नहीं आता हैँ उसे इंसान किया कोई भी पशु और पक्षी भी अनुसरण नहीं करता हैँ यही एक कड़वी सच्चाई हैँ अब रही बात इंसान का अपने निजी कार्यों से सम्बंधित कर्मों की तो एक इंसान को कर्म ही पूजा हैँ इस भाव और भावना से काम करना चाहिए अन्यथा वो दिन दूर नहीं ज़ब ये दुनिया तो रहेगी किन्तु उसमें आप और हम नहीं रहेंगे और यही जीवन का सार भी हैँ जो आया हैँ वो जाएगा सो बी केयरफुल अपने – अपने विवेक का प्रयोग करें!जैसी जिसकी सोच वैसी उसकी नियत ”

मुख्य संपादक – अरुण कुमार

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Prabin Kumar

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